
Karnataka कर्नाटक: कर्नाटक के मांड्या जिले में बाल मजदूरी के मामलों को लेकर प्रशासन ने गंभीर रुख अपनाया है। पिछले एक साल के भीतर जिले में 40 बाल मजदूरों की पहचान की गई है और संबंधित मामलों में 14 प्राथमिकी (FIR) दर्ज की गई हैं। यह जानकारी जिला स्तरीय कार्यकारी समिति और टास्क फोर्स की बैठक में सामने आई।
यह बैठक मंगलवार को मांड्या डिप्टी कमिश्नर कार्यालय के हॉल में आयोजित की गई, जिसमें बाल श्रम रोकथाम और पुनर्वास से जुड़े मुद्दों पर विस्तार से चर्चा की गई। बैठक की अध्यक्षता कर रहे डिप्टी कमिश्नर कुमार ने अधिकारियों को स्पष्ट निर्देश दिए कि 14 वर्ष से कम उम्र के बच्चों को किसी भी स्थिति में गैरेज, होटल, फैक्ट्री या अन्य कार्यस्थलों पर काम करते पाए जाने पर तुरंत कार्रवाई की जाए।
उन्होंने कहा कि ऐसे मामलों में केवल पहचान ही नहीं, बल्कि संबंधित प्रतिष्ठान मालिकों के खिलाफ सख्त कानूनी कार्रवाई भी आवश्यक है, ताकि बाल मजदूरी की प्रवृत्ति को रोका जा सके।
डिप्टी कमिश्नर ने यह भी जोर दिया कि बाल मजदूरी में फंसे बच्चों को केवल छुड़ाना ही पर्याप्त नहीं है, बल्कि उन्हें शिक्षा प्रणाली से जोड़ना भी उतना ही महत्वपूर्ण है। उनके अनुसार, हर बच्चे को स्कूल से जोड़ने और उन्हें शिक्षा का अधिकार दिलाने के लिए प्रभावी कदम उठाने होंगे।
बैठक में यह भी सुझाव दिया गया कि जिला प्रशासन को स्कूलों का नियमित निरीक्षण करना चाहिए, ताकि उन बच्चों की पहचान की जा सके जो बार-बार अनुपस्थित रहते हैं। इसके साथ ही ऐसे बच्चों के माता-पिता से बातचीत कर उनकी स्थिति और कारणों की जानकारी जुटाई जानी चाहिए।
अधिकारियों ने बताया कि कई मामलों में बच्चों को आर्थिक मजबूरी के कारण काम पर भेजा जाता है, इसलिए केवल कार्रवाई ही नहीं बल्कि सामाजिक जागरूकता और पुनर्वास योजनाओं पर भी ध्यान देना जरूरी है।
डिप्टी कमिश्नर कुमार ने अधिकारियों को निर्देश दिया कि बाल श्रम के खिलाफ चलाए जा रहे अभियानों को और अधिक प्रभावी बनाया जाए और नियमित रूप से छापेमारी की जाए। उन्होंने कहा कि बच्चों का भविष्य सुरक्षित करना प्रशासन की प्राथमिक जिम्मेदारी है।
बैठक में यह भी तय किया गया कि बाल मजदूरी के मामलों पर निगरानी बढ़ाने के लिए विभिन्न विभागों के बीच बेहतर समन्वय स्थापित किया जाएगा। साथ ही, स्थानीय स्तर पर जागरूकता अभियान भी चलाए जाएंगे ताकि लोग बाल श्रम के खिलाफ कानूनों को समझ सकें।
प्रशासन का मानना है कि यदि समय पर हस्तक्षेप किया जाए तो बच्चों को बाल मजदूरी के चक्र से बाहर निकालकर शिक्षा की मुख्यधारा में लाया जा सकता है।





